दादी माँ भड़की पड़ी थीं ..

“ आज कल की पिक्चर्स तो बस रे बस कितनी वाहियात बातें क्या डॉयलॉग , सीन्स , गानों के बोल , पिक्चराइजेशन , हाय हत्या , वायोलेन्स … हद ही हो गयी ! बच्चों के साथ बैठ कर कोई कैसे देख सकता है , हमारे ज़माने में ये सब नहीं था … राम राम ! “

उनका अपना कमरा था , देवघर से लगा हुआ , जहाँ वो अपनी दुनियाँ में मस्त रहती , कोई आता जाता नहीं था उनके कमरे में उन्हें पसंद भी नहीं था उनके पूजा पाठ में कोई दखल दे ।

टीवी भी लगा दिया गया था कमरे में सो , कुछ न कुछ देखती रहतीं थीं … पड़ी पड़ी ।

बाकी घर के लोग सर झुकाए खड़े थे पर … मुस्कुरा भी रहे थे … ! आज जा कर पता चला था सबको कि दादी दिन भर क्या देखती थीं ।

यह कहानी मेरे पिताजी ने लिखी है

निरंजन धुलेकर ।

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