मेरी अपनी एक भारी भरकम लाइब्रेरी है ।

लाइब्रेरी मतलब ज़्यादातर विमोचनो में मिली , गिफ्टेड , ज़बरन प्रेषित इसलिए अनपढी भारी भारी किताबो से सजी धजीं अलमारियाँ !

टेबल कुर्सी साइड लैंप और एक पेन स्टैंड भी है । जिसमे दस बारह पेन जिसकी रिफिल या तो सूख चुकी है या है ही नहीं , यानी ये चलते नहीँ है , इसलिए लिखते भी नहीं ।

उन्हें मुझे फेंक देना चाहिए था पर लाइब्रेरी में किताबें हैं तो क़लम भी होनीं चाहिए , दस्तूर है ।

एक फ्लावर पॉट भी साइड टेबल पर रक्खा है जिसमे नक़ली फूल अपनी किस्मत पर मुस्कुराते रहते हैं , बेजान , बे ख़ुशबू पर बेहद खूबसूरत !

कुर्सी के पीछे दीवाल पर मैंने एक पेंटिंग शौक से छाँट कर लायी लगाई । जिसमे दिखते है बस क़लम , दवात और काग़ज़ जिस पर आँसूं बिखरे पड़े हों ।

ये पेंटिंग मुझे एक बेहद संजीदा इंसान दिखाने की कोशिश करती है ।

मैंने तय किया था कि मेरी कुर्सी के पीछे वाली बुक रैक में सारी किताबें मोटी होनीं चाहिए जिनकी जिल्द पर लेखक का नाम स्पष्ट दिखाई दे और मेरा भी रुतबा बढ़ा दे !

मुझे बड़ा शौक था ये सब करने का ! ख़ुदा का शुक्र है पूरा भी हुआ ।

इस बैकग्राउंड के साथ लाइब्रेरी में बैठने से बड़ा रौब पड़ता है आने जाने वालों पर ! साहब क़िताबों और पढ़ने लिखने के बड़े शौकीन लगते हैं , पढ़े लिखे हैं , ख़ुद भी पढ़ते लिखते तो होंगे ही ।

एक आदमी घर के सामने से साइकिल पर रोज़ गुजरता पर लाइब्रेरी के सामने रुक कर बड़ी हसरत और शौक से इन मोटी किताबों को देखता , और मैं उसे !

मुझे उसकी आँखों मे , अजीब सी भूख नज़र आती थी ! इसे कहते हैं किताबो को पढ़ने का शौक , मैं उसे पूरा मौका देता अपना ये शौक पूरा करने का ।

एक दिन रहा नही गया मैंने उसे बाइज़्ज़त लाइब्रेरी में बुलाया । वो चारो तरफ़ किताबो से भरी अलमारियाँ बड़े शौक से देख रहा था .. ख़ुशी से झूम रहा था ।

मैने बाइज़्ज़त उसे कहा , “ किताबें हमारी धरोहर हैं , बेहद क़ीमती है ये ! तुम्हे बहुत शौक है न इन किताबों का .. ले जाओ जितनी तुम्हे चाहिए , अपना पढ़ने लिखने का शौक पूरा करो !”

बोला , “ साब भगवान आपको लंबी उम्र दे , मेरे मन की मुराद आपने पूरी कर दी ! आप यही रुको मैं दस मिनट में ठेला ले कर आता हूँ , पूरा माल लूँगा आपके लिए स्पेशल रेट दस रुपये किलो …!”

मैं आसमान से ज़मीन पर आ गिरा ।

सच्चाई सामने आ चुकी थी पर एक सवाल आसमान फाड़ने लगा कि ये इन क़िताबों का क्या करेगा , सो पूछ लिया ।

उसने बताया कि न्यू कॉलोनी में किसी ठेकेदार ने आलीशान बंगला बड़े शौक से बनवाया है । बेचारा पढ़ लिख नही पाया पर घर मे एक बेहतरीन लाइब्रेरी हो ये उसका भी शौक है .. .उसे किताबों पर खर्चा करने का कोई शौक बचपन से ही नही रहा …. ये किताबेँ बीस रुपये किलो के हिसाब से वहीं जाएंगी …!

यह कहानी मेरे पिताजी ने लिखी है

— — निरंजन धुलेकर

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