स्टेडियम

मम्मी , सुमन ठीक ही बोल रही है, तुम भी थोड़ा अब एडजेस्ट किया करो न …. “ बेटे की आवाज़ थी !

मेरा ध्यान आजकल पढ़ने लिखने में कम ही लग रहा था ! कुछ चल रहा था घर मे जिसे मैं तो समझ रहा था पर इसे भारी पड़ रहा था ! पैंतीस साल से गृहस्थी संभाली इसने, एकछत्र राज्य ! हर बात में फाइनल डिसीज़न इसका !

डेढ़ महीना हुआ बेटे के घर आये , शुरू में तो बहु और ये दोनों ख़ुश थे ख़ूब पटरी खा रही थी । रात को मुझे सब बताती .. क्या क्या इस घर मे अच्छा है , क्या अपने घर से भी अच्छा है और … क्या उसे पसंद नहीं !

धीरे धीरे नापसंद चीज़ों और बातों की लिस्ट लम्बी होने लगी .. और इसकी नींदे छोटी ! समझ गया…